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भारत की जलवायु

भारत की जलवायु (Climate of India)

  • जलवायु (Climate): लंबे समय की मौसमी दशाओं के औसत से होता है। (दीर्घकालिक)
  • मौसम (Weather): वायुमण्डल की क्षणिक अवस्था। (अल्पकालिक)
  • भारत की जलवायु: उष्ण कटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate)
नोट: ‘मानसून’ शब्द अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से बना है, जिसका प्रयोग सबसे पहले अरब भूगोलवेत्ता अल मसूदी द्वारा किया गया। इसका अर्थ है – पवनों की दिशा का मौसम के अनुसार उलट जाना।

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक (LANDFORMS)

जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों को LANDFORMS शब्द से याद रखा जा सकता है:

  • L Lattitude (अक्षांश)
  • A Altitude (ऊंचाई)
  • N Nearness from Sea (समुद्र से दूरी)
  • D Direction of Wind (पवन की दिशा)
  • F Forests (वन)
  • O Ocean Currents (महासागरीय धाराएं)
  • R Rainfall (वर्षा)
  • M Mountains (पर्वत)
  • S Soil (मिट्टी)

महत्वपूर्ण कारकों का विवरण:

  • अक्षांश (Latitude): भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। कर्क रेखा (23½° N) भारत के मध्य से (8 राज्यों से) गुजरती है।
    • उत्तरी भाग: शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zone) – भूमध्य रेखा से दूर, कम तापमान।
    • दक्षिणी भाग: उष्ण कटिबंध (Tropical Zone) – भूमध्य रेखा के निकट, वर्षभर उच्च तापमान।
  • समुद्र तल से ऊंचाई (Altitude): ऊंचाई बढ़ने पर तापमान घटता है।


    दर: प्रति 165 मीटर की ऊंचाई पर 1°C तापमान में कमी।
  • पवनों की स्थिति एवं दिशा:
    • हिमालय की भूमिका: उत्तर में स्थित हिमालय पर्वत आर्द्र मानसूनी पवनों को रोककर पूरे उत्तरी भारत में वर्षा करवाता है। साथ ही, शीत ऋतु (Winter Season) में साइबेरिया से आने वाली ठंडी व शुष्क हवाओं से रक्षा करता है।
    • उत्तरी पर्वत श्रेणियाँ: दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए अवरोध का कार्य करता है एवं भारतीय उपमहाद्वीप व मध्य एशिया के बीच जल विभाजक का कार्य करती हैं।
    • मेघालय का पठार: कीपाकार पहाड़ियों के कारण मानसूनी पवनों से विश्व में सर्वाधिक वर्षा (मासिनराम, चेरापूंजी) प्राप्त करता है।
    • अरावली: मानसूनी पवनों के समानांतर होने के कारण वर्षा नहीं रोक पाती (राजस्थान में कम वर्षा का कारण)।
  • समुद्र तट से दूरी: भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा है (प्रायद्वीपीय स्थिति)। तटीय क्षेत्रों में समुद्री जलवायु का प्रभाव (समकारी जलवायु) पाई जाती है।
  • उच्चावच: तापमान, वायुदाब, पवनों की गति दिशा तथा ढाल वर्षा की मात्रा तथा वितरण को प्रभावित करते हैं।

वायुदाब व पवनों से जुड़े कारक

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1. मानसूनी पवनें (Monsoon Winds)

  • ग्रीष्म ऋतु: पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं। समुद्र के ऊपर से आने के कारण ये आर्द्र होती हैं, अत: संपूर्ण भारत में प्रचुर वर्षा करती हैं। (दिशा: दक्षिण-पश्चिम)।
  • शीत ऋतु: पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। स्थल के ऊपर से आने के कारण ये शुष्क होती हैं और वर्षा करने में असमर्थ होती हैं।
    अपवाद: बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प प्राप्त करने के बाद तमिलनाडु तट पर वर्षा करती हैं। (दिशा: उत्तर-पूर्व)।

2. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance)

शीत ऋतु में भूमध्य सागरीय प्रदेश (Mediterranean Region) से भारत में आते हैं।

  • प्रभाव: भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम को प्रभावित करते हैं।
  • प्रभाव क्षेत्र: देश के उत्तरी मैदानी भागों एवं पश्चिमी हिमालय (J&K, Himachal, Uttarakhand) में शीतकालीन वर्षा।
  • वर्षा (मावठ): शीतकालीन वर्षा को ‘मावठ’ कहते हैं। यह रबी की फसल के लिए लाभदायक है। पहाड़ी क्षेत्रों में हिमपात (Snowfall) होता है।

3. अल-नीनो और ला-नीना प्रभाव

(A) अल-नीनो (El-Nino)

  • उत्पत्ति: प्रशांत महासागर में पूर्व-पश्चिम की ओर उत्तरी विषुवत रेखीय धारा तथा द. विषुवत रेखीय धारा प्रवाहित, जो गर्म जल धारा हैं। दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के पश्चिमी तट पर पेरू के तट से 180 km की दूरी पर द. पू. प्रशांत महासागर में 3° से 36° दक्षिणी अक्षांश तक उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होने वाली गर्म जल धारा।
  • प्रभाव: अलनीनो के प्रभाव से भारतीय मानसून दुर्बल (Weak) हो जाता है, अर्थात मानसूनी हवाएं भारत की मुख्य भूमि पर देरी से आती हैं और औसत वार्षिक वर्षा में भी कमी आती है। (ऋणात्मक प्रभाव)।

(B) ला-नीना (La-Nina)

  • अर्थ: ‘छोटी बच्ची’। यह अलनीनो की छोटी बहन है।
  • उत्पत्ति: अलनीनो के पश्चात। इसके समय भूमध्यरेखीय पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू के तट के समीप जल का तापमान 3°-5°C कम हो जाता है तथा पश्चिमी प्रशांत महासागर में इंडोनेशिया के पूर्वी तट के समीप जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है।
  • प्रभाव: ला-नीना के समय भारतीय मानसून प्रबल (Strong) होता है। भारत की मुख्य भूमि पर जल्दी आता है और औसत वार्षिक वर्षा की मात्रा अधिक होती है। (धनात्मक प्रभाव)।

4. जेट स्ट्रीम (Jet Stream)

ऊपरी वायुमंडल (9-18 km) में तीव्र गति से चलने वाली वायु प्रवाह। गति: अधिकतम 340 km/hr।

  • पश्चिमी जेट स्ट्रीम: शीत ऋतु में अति तीव्र। इसके कारण पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागरीय प्रदेश से भारतीय उपमहाद्वीप में आते हैं।
  • परिणाम: उत्तरी मैदानी क्षेत्र के राज्य (पंजाब, हरियाणा, UP, Delhi) और पहाड़ी प्रदेश (J&K, Himachal Pradesh, Uttarakhand) में शीतकालीन वर्षा व ओलावृष्टि (हिमपात)।

भारत में ऋतुएं (Seasons in India)

  1. शीत ऋतु (Winter): मध्य दिसंबर से फरवरी तक।
  2. ग्रीष्म ऋतु (Summer): मार्च से मध्य जून तक।
  3. वर्षा ऋतु (Rainy/Monsoon): मध्य जून से सितंबर तक।
  4. शरद ऋतु (Autumn/Retreating Monsoon): अक्टूबर से मध्य दिसंबर तक।

वर्षा का वितरण (Rainfall Distribution)

भारत में औसत वार्षिक वर्षा: 125 cm है। प्रादेशिक वितरण में अत्यधिक असमानता पाई जाती है। इसके आधार पर चार वितरण हैं:

श्रेणी वर्षा (cm) प्रमुख क्षेत्र
अधिक वर्षा वाला क्षेत्र 200 cm से अधिक पश्चिमी घाट पर्वत का पश्चिमी ढाल, अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह, उत्तरी पूर्वी क्षेत्र।
मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र 100 – 200 cm गंगा का मैदान, TamilNadu, Odisha, Jharkhand, Chattisgarh, MP का पूर्वी भाग।
न्यून वर्षा वाले क्षेत्र 50 – 100 cm Punjab, Haryana, Western UP, Gujarat, East Raj, दक्कन का पठार (वृष्टि छाया क्षेत्र)।
अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र 50 cm से कम पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख, J&K, पश्चिमी घाट का वृष्टि छाया प्रदेश।
वर्षा की परिवर्तिता (Variability of Rainfall):

  • जिन क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा कम होती है, वहां वर्षा की अनिश्चितता (परिवर्तिता) अधिक होती है। (सर्वाधिक परिवर्तिता: Ladakh, Jaisalmer, Andhra + Karnataka – पूर्वी भाग)।
  • जिन क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा अधिक होती है, वहां वर्षा की परिवर्तिता कम होती है। (न्यूनतम परिवर्तिता: पश्चिमी घाट पर्वत का पश्चिमी ढाल, Andaman-Nicobar, उत्तर-पूर्वी भारत)।

दक्षिण-पश्चिम मानसून की शाखाएं

दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत की आकृति के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून दो शाखाओं में बंट जाता है:

(1) अरब सागरीय शाखा (Arabian Sea Branch)

  • उपशाखा 1 (पश्चिमी घाट): पश्चिमी घाट पर्वत के पश्चिमी ढाल पर टकराकर, ढाल के सहारे ऊपर उठती है और संघनन के कारण अत्यधिक वर्षा प्रदान करती है (जैसे: महाबलेश्वर में 650 cm)। जब ये हवाएँ पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती हैं, तो तापमान वृद्धि के कारण सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और पूर्वी ढाल पर अल्प मात्रा में वर्षा होती है (वृष्टि छाया प्रदेश – जैसे पुणे 190 cm)।
  • उपशाखा 2 (मध्य भारत): मुंबई के उत्तर में नर्मदा व ताप्ती नदियों की घाटियों से MP होते हुए गुजरात व बिहार में गंगा के मैदान में बंगाल की खाड़ी की शाखा से मिल जाती है।
  • उपशाखा 3 (अरावली): गुजरात के सौराष्ट्र प्रायद्वीप एवं कच्छ क्षेत्र से होते हुए राजस्थान में अरावली पर्वत के समानांतर आगे निकल जाती है और हिमालय के दक्षिणी ढाल से टकराकर पर्याप्त वर्षा प्रदान करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)

  • बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाएं उत्तर-पूर्वी भारत में पर्वतीय भागों से टकराकर अत्यधिक वर्षा प्रदान करती हैं।
  • मेघालय का पठार: पश्चिम से पूर्व की ओर गारो-खासी-जयंतिया की पहाड़ियों का विस्तार। ये पहाड़ियाँ कीपाकार रूप में विस्तृत हैं, जिनका खुला हुआ भाग बंगाल की खाड़ी की ओर है। मानसूनी हवाएं इनमें फंसकर दक्षिणी ढालों पर अत्यधिक वर्षा करती हैं।
  • गंगा का मैदान: उत्तर-पश्चिमी भारत में निर्मित निम्न वायुदाब के प्रभाव से गंगा के मैदान में पूर्व से पश्चिम की ओर अग्रसर होती हैं। जैसे-जैसे यह पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती है, नमी कम होने से वर्षा की मात्रा में कमी आती है।

मानसून पूर्व वर्षा (Pre-Monsoon Showers)

ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी भारत में दोपहर के पश्चात (ITCZ – Inter Tropical Convergence Zone के केंद्र में) चलने वाली स्थानीय वर्षा:

1. आम्र वर्षा (Mango Shower)

क्षेत्र: कर्नाटक व केरल के तटीय भाग।

महत्व: स्थानीय तूफानों से प्राप्त वर्षा आम की फसल (Mangifera Indica) के पकने के लिए लाभदायक।

2. फूलों की बौछार (Cherry Blossom)

क्षेत्र: कर्नाटक व केरल।

महत्व: ग्रीष्म ऋतु में होने वाली वर्षा कहवा (Coffee) के फूल खिलने के लिए लाभदायक। (कर्नाटक में कॉफी का सर्वाधिक उत्पादन)।

3. काल बैशाखी (Norwester)

क्षेत्र: पश्चिम बंगाल (काल बैशाखी) व असम (बारदोली छिड़ा)।

दिशा: उत्तर-पश्चिम।

महत्व: जूट/पटसन और चाय की फसल के लिए लाभदायक, लेकिन अत्यधिक प्रचंड तूफान (60-80 km/hr)।

4. लू (Loo)

क्षेत्र: उत्तर-पश्चिम भारत।

प्रकृति: गर्म, शुष्क व पीड़ादायक पवनें।

मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

  • तापीय संकल्पना (Classical Theory): 1686 में एडमंड हैली द्वारा। (वृहद स्थलीय समीर व जलीय समीर)।
  • गतिक सिद्धांत / ITCZ सिद्धांत: फ्लॉन द्वारा प्रदत्त। (विषुवत रेखीय पछुआ हवा सिद्धांत)।
  • जेट स्ट्रीम सिद्धांत (Modern Theory): M.T. येन + कोटेश्वरम
  • अन्य सिद्धांत: मॉनेक्स सिद्धांत (MONEX – भारत व सोवियत संघ के वैज्ञानिकों द्वारा), सोमालियन धारा सिद्धांत, अल-नीनो/ला-नीना।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Koppen’s Classification)

कोपेन ने वनस्पति (Vegetation) के वर्गीकरण (कैंडी के वर्गीकरण) से प्रेरित होकर 1918 (संशोधन 1931, 1936) में विश्व को जलवायु प्रदेशों में बांटा। भारत के 9 जलवायु प्रदेश:

कूट (Code) जलवायु प्रकार विस्तार / क्षेत्र (Region)
Amw उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (लघु शुष्क ऋतु) कोंकण तट, मालाबार तट, कर्नाटक का तटीय भाग। (औसत वर्षा > 300 cm)।
Aw उष्णकटिबंधीय सवानातुल्य जलवायु दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में कर्क रेखा के दक्षिण में (कोरोमंडल तट को छोड़कर)। पर्णपाती वनों के साथ घास क्षेत्र।
As उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु (शुष्क ग्रीष्म) दक्षिण भारत में कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) पर। (शीत ऋतु आर्द्र, ग्रीष्म ऋतु शुष्क)।
Bwhw उष्ण कटिबंधीय शुष्क/मरुस्थलीय जलवायु पश्चिमी राजस्थान में थार के मरुस्थलीय क्षेत्र में विस्तृत।
Bshw उष्ण कटिबंधीय अर्द्धशुष्क/स्टेपी जलवायु पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान में अरावली के पश्चिमी भाग में, पश्चिमी घाट पर्वत के वृष्टि छाया प्रदेश (Andhra Pradesh का सीमावर्ती भाग)।
Cwg गंगा के मैदान तुल्य जलवायु उत्तरी भारत में गंगा के मैदानी भाग में तथा अधिकांश उत्तर-पूर्वी भारत, पूर्वी राजस्थान, MP। (शुष्क शीत ऋतु)।
Dfc लघु ग्रीष्म एवं ठंडी आर्द्र शीत ऋतु अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh), सिक्किम, असम।
ET टुण्ड्रा जलवायु प्रदेश J&K, Uttarakhand, Himachal Pradesh में हिमालय पर्वत पर 3000-5000m की ऊंचाई तक।
Ef (E) ध्रुवीय जलवायु (सतत हिमाच्छादित) J&K, Uttarakhand, Himachal Pradesh, > 5000m की ऊंचाई पर।

वायुदाब (Air Pressure)

  • प्रति इकाई क्षेत्रफल पर वायु द्वारा लगने वाले दाब को वायुदाब कहते हैं।
  • मापन की इकाई: mb (milli Bar)। 1 mb = 1 gm।
  • मापक यंत्र: बैरोमीटर (Barometer)।
  • सर्वाधिक वायुदाब समुद्र तल (Sea Level) की ओर लगता है।
  • न्यूनतम वायुदाब सर्वाधिक ऊंचाई (पर्वत) की ओर लगता है। (Height ज्यादा होने पर वायुदाब कम)।