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भारत की मृदा
मृदा (Soil) भूमि की वह ऊपरी परत है जो चट्टानों के विखंडन और जीवांशों (Humus) के मिश्रण से बनती है, जिसका अध्ययन ‘Pedology’ कहलाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मृदा को 8 मुख्य वर्गों में विभाजित किया है। इनमें जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल (43.4%) पर फैली है और यह ‘भारत का अन्न भंडार’ कहलाती है। दक्कन के पठार की काली मृदा (Black Soil) कपास के लिए सर्वोत्तम है, जिसे ‘रेगुर’ भी कहते हैं। दक्षिण भारत में लाल-पीली मृदा, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लैटेराइट मृदा (भवन निर्माण हेतु) और राजस्थान के थार मरुस्थल में मरुस्थलीय मृदा पाई जाती है। मिट्टी की उर्वरता को बचाने के लिए 19 फरवरी 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ से ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना’ की शुरुआत की गई थी।

भारत की मृदा (Soils of India – bharat ki mrida)
- उत्पत्ति (Origin): लैटिन भाषा के शब्द ‘Solum’ से।
- परिभाषा: भूमि की वह ऊपरी परत जो चट्टानों (Rocks) के विखंडन और जीवांशों (Humus) के सड़ने-गलने से बनती है।
- अध्ययन (Study):
- Pedology: मृदा निर्माण का अध्ययन।
- Edaphology: पौधों के उत्पादन से संबंधित मृदा के गुणों का अध्ययन।
मृदा के घटक (Components):
- खनिज कण (Minerals)
- ह्यूमस (Humus)
- जल (Water)
- वायु (Air)
महत्वपूर्ण तथ्य:
- विश्व मृदा दिवस (World Soil Day): 5 दिसंबर। (Theme: The Future of Soil Health)।
- अंतर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष: 2015।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: 19 फरवरी 2015 (सूरतगढ़, राजस्थान से शुरू)। थीम: “स्वस्थ धरा, खेत हरा”। उद्देश्य: खराब होती गुणवत्ता की जांच और कृषि उत्पादकता बढ़ाना।
- कार्ड का नवीनीकरण: प्रत्येक 3 वर्ष पर।
- अम्लीयता (Acidity) दूर करने के लिए: चूना पत्थर।
- क्षारीयता (Alkalinity) दूर करने के लिए: जिप्सम।
- pH मान: < 7 (अम्लीय), 7 (उदासीन), > 7 (क्षारीय)।
मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile / Soil Horizon)
मृदा की लंबवत काट (Vertical Section) को मृदा परिच्छेदिका कहते हैं। इसे संस्तरों (Horizons) में बांटा गया है:

भारत की मृदा का वर्गीकरण (bharat ki mrida ka vargikaran)
ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) – स्थापना: 16 जुलाई 1929, नई दिल्ली।
ICAR ने 1956 में भारत की मिट्टियों (bharat ki mittiyan) को 8 मुख्य वर्गों में विभाजित किया।
| क्रम | मृदा का प्रकार (bharat ki pramukh mitiya) | प्रतिशत (%) | वैज्ञानिक नाम (USDA Classification) |
|---|---|---|---|
| 1. | जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) | 43.4% (सर्वाधिक) | Inceptisols (खादर), Entisols (बांगर) |
| 2. | लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil) | 18.6% | Alfisols (आर्द्र जलवायु वाले प्रदेश) |
| 3. | काली मृदा (Black Soil) | 15.2% | Vertisols (South India की Black soil) |
| 4. | लैटेराइट मृदा (Laterite Soil) | 3.7% | Ultisols |
| 5. | मरुस्थलीय मृदा (Desert Soil) | 4.42% | Aridisols (शुष्क क्षेत्र – Raj, Gujarat, Haryana) |
| 6. | पर्वतीय मृदा (Mountain Soil) | – | Mollisols (मुख्यतः उत्तरी पर्वतीय प्रदेश) |
| 7. | लवणीय व क्षारीय (Saline & Alkaline) | – | – |
| 8. | पीटमय / जैविक मृदा (Peaty Soil) | – | Histosols (पीट व दलदली मृदा) |
भारत में मिट्टी के प्रकार (bharat ki pramukh mitiya)
1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)
- निर्माण: नदियों द्वारा लाए गए अवसादों (Sediments) के जमाव से। (हिमालय की नदियाँ)।
- विस्तार: भारत के सर्वाधिक क्षेत्रफल (43.4%) पर। (उत्तर का विशाल मैदान – Punjab, Haryana, UP, Bihar, WB, Assam; पूर्वी तटीय मैदान, नदी घाटियाँ)।
- अन्य नाम: कछारी, दोमट मिट्टी।
- पोषक तत्व: पोटाश व चूने की अधिकता। नाइट्रोजन, फास्फोरस व ह्यूमस की कमी।
- उपयोग: कृषि (Agriculture) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त। (भारत का अन्न भंडार)।
- वर्गीकरण:
- (a) तराई प्रदेश की जलोढ़: हिमालय के पर्वतपदीय क्षेत्र में। नाइट्रोजन अधिक। गन्ने की कृषि के लिए उपयुक्त।
- (b) बांगर (Bangar): पुरानी जलोढ़। बाढ़ का पानी नहीं पहुँचता। गहरे रंग की। रबी की फसल (गेहूं) के लिए उपयुक्त। (विस्तार: UP, Punjab, Haryana)।
- (c) खादर (Khadar): नवीन जलोढ़। बाढ़ का पानी प्रतिवर्ष पहुँचता है। हल्के रंग की। सर्वाधिक उपजाऊ। खरीफ की फसल (चावल, जूट) के लिए उपयुक्त।
2. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil)
- विस्तार: जलोढ़ के बाद सर्वाधिक क्षेत्रफल (18.6%)। दक्षिण भारत (प्रायद्वीपीय पठार) के पूर्वी व दक्षिणी भाग में। (TN, Karnataka, Andhra, Odisha, Jharkhand, Chhattisgarh)।
- रंग का कारण:
- लाल: लौह ऑक्साइड (Iron Oxide) की उपस्थिति (ऊपरी क्षेत्रों में)।
- पीला: जलयोजित (Hydrated) होने पर (निम्न भूमि क्षेत्रों में)।
- फसलें: मोटे अनाज, दलहन, तिलहन।
3. काली मृदा (Black Soil)
- निर्माण: क्रिटेशियस काल में बेसाल्टिक लावा के दरारी उद्भेदन और विखंडन से।
- अन्य नाम: रेगुर (Regur), कपासी मृदा, उष्णकटिबंधीय चरणोजम (Chernozem), स्वत: जुताई वाली मिट्टी।
- विस्तार: 15.2% भाग पर। दक्कन का पठार (महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी MP, उत्तरी कर्नाटक, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान – हाड़ौती, मालवा का पठार)।
- विशेषता:
- जल धारण क्षमता (Water Absorption) सर्वाधिक। (शुष्क कृषि के लिए उपयुक्त)।
- गीली होने पर चिपचिपी, सूखने पर दरारें पड़ जाती हैं।
- रंग काला: टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट और जीवांश की उपस्थिति के कारण।
- तत्व: लोहा, एल्युमिनियम, मैग्नीशियम, चूना, पोटाश की अधिकता। नाइट्रोजन, फास्फोरस, ह्यूमस की कमी।
- फसल: कपास (Cotton) के लिए सर्वश्रेष्ठ।
4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)
- उत्पत्ति: लैटिन शब्द ‘Later’ (ईंट/Brick) से।
- निर्माण (प्रक्रिया): उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु (200cm+ वर्षा) वाले क्षेत्रों में निक्षालन (Leaching) द्वारा। (सिलिका व चूना निथार कर नीचे चले जाते हैं, लोहा व एल्युमिनियम के ऑक्साइड ऊपर रह जाते हैं)।
- प्रकृति: अम्लीय (Acidic Nature)। (अधिक तापमान के कारण जीवाणु क्रिया अधिक, ह्यूमस की कमी)।
- विस्तार: पश्चिमी घाट के शिखर (Kerala, Karnataka, Maharashtra), मेघालय का पठार (Assam), ओडिशा के पठारी भाग। (केरल में सर्वाधिक)।
- फसल: बागानी फसलें (चाय, कॉफी, काजू, रबर, सिनकोना)। भवन निर्माण (ईंट) में उपयोगी।
5. मरुस्थलीय / शुष्क मृदा (Arid/Desert Soil)
- विस्तार: पश्चिमी राजस्थान (थार का मरुस्थल), पंजाब, दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा, उत्तरी गुजरात।
- विशेषता: रेत की मात्रा अधिक (90-95%), नमी की कमी। घुलनशील लवण और फास्फोरस की अधिकता। ह्यूमस व नाइट्रोजन का अभाव। रेतीली/बलूई मिट्टी।
- फसल: सिंचाई सुविधा मिलने पर बाजरा, ज्वार, ग्वार, गेहूं (गंगानगर – इंदिरा गांधी नहर)।
6. पर्वतीय मृदा (Mountain Soil)
- प्रकृति: अपरिपक्व (Immature) मृदा। पतली परत। कंकड़-पत्थर युक्त।
- विस्तार: हिमालय पर्वतीय क्षेत्र (J&K से अरुणाचल तक) और दक्षिण भारत की पहाड़ियाँ।
- फसल: पर्वतीय ढालों पर बागानी फसलें – चाय, कॉफी, मसाले, फल (सेब, नाशपाती)।
7. लवणीय व क्षारीय मृदा (Saline & Alkaline Soil)
- निर्माण: शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में जल निकास की कमी और केशिकाकर्षण (Capillary Action) से सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम के लवण सतह पर जमा हो जाते हैं।
- विस्तार: गुजरात (कच्छ), पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP, सुंदरवन।
- अन्य नाम: रेह, कल्लर, ऊसर, चोपन।
- उपचार: जिप्सम (Gypsum) का प्रयोग। (अम्लीयता दूर करने के लिए चूना पत्थर)।
- तत्व: सोडियम सल्फेट, सोडियम बाइकार्बोनेट की अधिकता।
8. पीटमय / जैविक मृदा (Peaty/Organic Soil)
- विस्तार: भारी वर्षा और उच्च आर्द्रता वाले दलदली क्षेत्र। (डेल्टाई भाग, तटीय क्षेत्र)। सुंदरवन डेल्टा (WB), केरल (अलापुझा – कारी मृदा), उत्तराखंड (अल्मोड़ा)।
- विशेषता: जैविक पदार्थों (Humus) की मात्रा सर्वाधिक (40-50%)। रंग गहरा काला/नीला। अम्लीय प्रकृति।
- फसल: चावल, जूट।